Thursday, August 26, 2010

चाहिए, बस चाहिए

चाहिए, बस चाहिए

क्या चाहिए इन्हें
नाम - शोहरत
धन - दौलत
मिल जाये तो?
फिर और चाहिए, और, और...
न मिले तो,
कैसे भी चाहिए...

पर इस चाह के पीछे
कौन सी चाह है,
इसे तो समझा ही नहीं

चाह के पीछे थी
तलाश ख़ुशी की
तलाश आनंद और मस्ती की
तलाश उस अद्भुत प्रेम की
पर मिला क्या?
पहुचे कहाँ?
जहाँ न सुख बचा, न आनंद और न प्रेम...

बटोरने कि होड़ ने
सारे संबंधों से दूर कर दिया

अजीब अकेलेपन से घिरे हैं सब आज
गलती हुई?
पर कहाँ ?
आज भी समझ कहाँ पा रहा
क्यूंकि अब भी दोष
दूसरों में ही दूंढ रहा

वाह रे इन्सान वाह
खुद को शैतान बना
अब शैतान को ही दोष दे रहा...

11 comments:

  1. जीवन में चाहिए होता है प्यार
    वही होता है आरम्भ
    वही होता है विराम
    वही गीत
    वही धुन
    वहाँ कोई होड़ नहीं
    क्योंकि होता है विश्वास का सुकून
    ये जो है वो अपना है

    ReplyDelete
  2. "chahat hai itni ki har chahat me mere dum nikle..."

    aisa hi kuchh suna tha......:)
    lekin fir bhi kahan chah marr pati hai.....

    bahut khubsurat rachna!!

    ReplyDelete
  3. चाह के पीछे थी
    तलाश ख़ुशी की
    तलाश आनंद और मस्ती की
    तलाश उस अद्भुत प्रेम की..
    वाह! अत्यंत सुन्दर रचना! दिल को छू गयी!

    ReplyDelete
  4. suman jee
    pranam !
    aap ke blog pe aa kar achcha laga.
    sadhuwad ,
    saadar

    ReplyDelete
  5. चाह के पीछे थी
    तलाश ख़ुशी की
    तलाश आनंद और मस्ती की
    तलाश उस अद्भुत प्रेम की
    पर मिला क्या?
    पहुचे कहाँ?
    जहाँ न सुख बचा, न आनंद और न प्रेम...
    मानवीय रिश्तों के प्रति आपके सरोकार संवेदनापूर्ण है .भौतिक सुख के पीछे दौड़ती दुनिया में यही होना है.

    ReplyDelete
  6. विचारणीय प्रस्तुति!

    शुभकामनाएं..

    ReplyDelete
  7. eiselogo ko vastav me kuchh nahi milta ant me

    ReplyDelete
  8. मंगलवार 31 अगस्त को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ....आपका इंतज़ार रहेगा ..आपकी अभिव्यक्ति ही हमारी प्रेरणा है ... आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

    ReplyDelete
  9. वाह रे इन्सान वाह
    खुद को शैतान बना
    अब शैतान को ही दोष दे रहा..

    शैतान भी तो इंसान के अंदर ही है ..... अपने आप को देश दे रहा है ..... बहुत लाजवाब रचना है ....

    ReplyDelete
  10. iss chaahiye ne kabhi to sukh ka ambaar diya, isi chaahiye ne dukh ki agni dee, par iss chaahiye mein koi santusht nahin, aur aur chaahiye...par kitna...fir sab nasht...shyad jiwan yahi hai. achhi rachna. shubhkaamnaayen.

    ReplyDelete